परमपूज्य मौनी बाबा

जन्म: 6 फरवरी 1863 · कहरा ग्राम, सहरसा, बिहार · महाप्रयाण: 6 फरवरी 1945

परमपूज्य मौनी बाबा
परमपूज्य मौनी बाबा

युगपुरुष – योगसिद्ध – कोसी क्षेत्र

जन्म 1863 कहरा ग्राम 1945
संक्षिप्त परिचय
बाल्यकाल नाममनमोहन मिश्र
जन्म6 फरवरी 1863
जन्म स्थानकहरा ग्राम, थाना मधेपुरा
जिलाभागलपुर (तत्कालीन), अब सहरसा
पितापं. बुलाकी मिश्र
भाईजगमोहन मिश्र, अनिरुद्ध मिश्र
काशी गुरुपं. पुरुषोत्तम जी शर्मा
कुटी स्थापना~1901, कहरा
महाप्रयाण6 फरवरी 1945, 11:55 बजे

प्रारम्भिक जीवन

परमपूज्य मौनी बाबा का जन्म 6 फरवरी 1863 ई. को ग्राम कहरा, थाना मधेपुरा, तत्कालीन जिला भागलपुर के एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में हुआ। बाबा के जन्म के समय सहरसा जिला नहीं था — 1953 ई. में भागलपुर के उत्तरी भाग से सहरसा जिला बना। उनका बाल्यकाल का नाम मनमोहन मिश्र था। पिता पं. बुलाकी मिश्र और दो सगे भाई जगमोहन मिश्र तथा अनिरुद्ध मिश्र थे।

बचपन से ही उनकी बुद्धि अत्यंत तीव्र थी। दस वर्ष की आयु में संस्कृत एवं ज्योतिषशास्त्र के अध्ययन हेतु ग्राम बलवा, सहरसा में पं. नब्बू मिश्रजी के यहाँ गए। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद संस्कृत विद्यालय सिहौल, सहरसा में दो वर्ष और अध्ययन किया।

संस्कृत व ज्योतिष

ग्राम बलवा और सिहौल विद्यालय में संस्कृत, ज्योतिष और वेद का गहन अध्ययन।

काशी गमन – 1879

1879 ई. में ज्योतिष और वेदांत की विशिष्ट शिक्षा के लिये काशी नगरी पधारे।

आध्यात्मिक यात्रा

सन् 1879 में काशी नगरी पहुँचे और वहाँ के प्रसिद्ध ज्योतिषी एवं वेदांत के मानस-मार्त्तण्ड पं. पुरुषोत्तम जी शर्मा के शिष्य बने। काशी में बाबा विश्वनाथ में उनकी अगाध आस्था रही और उन्होंने गीता के परमतत्त्व का वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया।

परमतत्त्व की प्राप्ति के बाद हृदय में विरक्ति आई। अपने चचेरे भाई पं. शंभुनाथ मिश्रजी के निधन के अंत्येष्टि दिन (काशी में) संसार से वैराग्य हो गया और ~1883 में गोरखपुर पहुँचे, जहाँ गुरु गोरखनाथ के परम शिष्य एक संन्यासी बाबा से योग की शिक्षा ली और गोरखपुर की पहाड़ी पर साधनारत रहे।

बड़े भाई पं. लक्ष्मीनाथ मिश्रजी खोजते-खोजते गोरखपुर पहुँचे और वापस लाने का आग्रह किया। बाबा ने सांसारिक बंधनों से मुक्त रखने की शर्त पर साथ चलना स्वीकार किया। ~1901 में पं. लक्ष्मीनाथ जी ने कहरा में एक कुटी बनाई जो बाबा की स्थायी साधना-स्थली बनी (यह कुटी 1903–04 के सर्वे मानचित्र में दर्ज है)।

~1920–21 में बद्रीनाथ यात्रा से लौटने के बाद बाबा ने सदा-सदा के लिये वाणी (वाक्) का परित्याग कर दिया और "मौनी बाबा" नाम से विख्यात हुए। प्राणायाम के समय उनका आसन पृथ्वी से शून्य में आ जाता था — इसके अनेक प्रत्यक्ष साक्षी हैं।

"मौन मनुष्य को स्वयं से मिलाता है।"

— परमपूज्य मौनी बाबा

आस्था, अलौकिक प्रतिभा एवं लोक-मान्यताएँ

परमपूज्य मौनी बाबा का संपूर्ण जीवन अलौकिक शक्तियों, जनकल्याण और निस्पृह अध्यात्म का प्रत्यक्ष प्रमाण था। आश्रम में ऊँच-नीच, वर्ग-भेद, जाति-भेद या अमीर-गरीब का कोई भेद-भाव नहीं था। बाबा की दृष्टि में सभी ईश्वर की समान संतानें थीं।

शारीरिक विशेषताएँ एवं बाल्यकाल:

बाबा बचपन से ही इस क्षणभंगुर संसार से विरक्त रहे और बाल्यावस्था में ही भगवती मंदिर के बालब्रह्मचारी पुजारी बने। अजान बाहु (घुटनों तक लंबे हाथ), भव्य देह, विस्तृत ललाट तथा सौम्य एवं गंभीर मुद्रा उनके दिव्य स्वरूप को दर्शाती थीं। गोरखपुर प्रवास के दौरान उन्हें गुरु गोरखनाथ के परम शिष्य एक संन्यासी बाबा (जिन्हें भगवान शंकर का अवतार माना गया) से दुर्लभ मंत्र विद्या का हस्तलिखित ग्रंथ प्राप्त हुआ, जिसे बाबा ने बाल्यकाल में ही सिद्ध कर लिया था।

🌟 लोक-मान्यताएँ एवं चमत्कारिक संस्मरण (बटेश महाराज की पुस्तक के आधार पर)

बैठने का संकेत (फाँसी से मुक्ति)

साक्षात्कार 1954: पूर्व सांसद अनूप लाल मेहता (बनमनखी, पूर्णियाँ) ने बताया कि बाबा की कुटी का नियम था — बाबा जिसे भी बैठने का संकेत करते थे, उसकी इच्छा अवश्य पूर्ण होती थी।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्री मेहता को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा फाँसी की सज़ा होने वाली थी। वे थके-हारे अंतिम शरण में कहरा कुटी पहुँचे। बाबा विश्राम कर रहे थे। अचानक बाबा उठ बैठे, श्री मेहता की ओर देखकर मुस्कुराए और बड़े स्नेह से बैठने का संकेत दिया। इस दिव्य आशीर्वाद से अंततः उनकी फाँसी की सज़ा टल गई और वे मुक्त हो गए।

"साधुओं की जात नहीं होती"

दारोगा कैलाश झा की कथा: कोसी काल में मिठाई (स्टेशन) थाना के दारोगा कैलाश झा कट्टर सनातनी नियमों के कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय और कायस्थ के अतिरिक्त कहीं जल भी ग्रहण नहीं करते थे, और वे घोर नास्तिक थे। संतान न होने से दुखी होकर वे कहरा कुटी पहुँचे।

बाबा की आँखों से मिलते ही उनका नास्तिक भाव समाप्त हो गया। बाबा ने उन्हें प्रसादी लेने का संकेत किया, तो दारोगा जी जाति-नियमों के कारण संकोच करने लगे। बाबा ने तक्षण पट्टिका पर लिखा — "साधुओं की जात नहीं होती। अगर तुम ब्राह्मण जानकर लेने से अपने प्रण का ख्याल करते हो तो मूर्खता है।" दारोगा जी चरणों में गिर पड़े, प्रसाद ग्रहण किया और आगे चलकर न केवल उन्हें पुत्र रत्न प्राप्त हुआ बल्कि वे बिहार पुलिस में तरक्की पाकर पुलिस अधीक्षक (SP) के पद तक पहुँचे।

अंग्रेजी भाषा व शिक्षा का महत्त्व

प्रधानाचार्य गोवर्द्धन प्रसाद सिंह: धबौली उच्च विद्यालय के प्रधानाचार्य गोवर्द्धन बाबू अपने क्षेत्र के सर्वप्रथम बी.एस.सी. ऑनर्स उत्तीर्ण छात्र थे। उस समय समाज का मानना था कि अंग्रेजी पढ़ने वाले धर्मभ्रष्ट (क्रिस्तान) हो जाते हैं।

जब वे डरे हुए बाबा के पास पहुँचे, तो बाबा ने उनका अत्यंत आदर किया और लिखा: "समाज के लोग तुम्हें क्रिस्तान कहेंगे यह समाज का पिछड़ापन है, शिक्षा का अभाव है। तुम विद्वान हो-समाज को शिक्षित करना एवं शिक्षा का प्रचार और प्रसार करना अपना कर्त्तव्य समझो। यह सबसे बड़ा धर्म है।" बाबा के वचनों से प्रेरित होकर उन्होंने अंग्रेजी सरकार की नौकरी छोड़कर विद्यादान में जीवन समर्पित कर दिया। बाबा कहते थे: "भिन्न-भिन्न भाषाओं को सीखकर सही रत्न की खोज करो, यही जीवन की सार्थकता है।"

कला व संगीत का प्रोत्साहन

कवि युगलराम 'प्रेम' जी का संस्मरण: मधेपुरा के कवि और संकीर्तन मर्मज्ञ युगलराम 'प्रेम' जी जब कहरा कुटी पर झूलन उत्सव के दौरान अपना स्वरचित कीर्तन सुनाने गए, तो भक्तगण झूम उठे।

कीर्तन समाप्त होने पर बाबा ने कवि की हस्तलिखित प्रति लेकर उस पर स्वयं अपने पवित्र हाथों से अंकित किया: "अनेन श्रीकृष्ण: प्रसन्‍नोभवतु इति मौनी" (इससे भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हों)। कवि ने बताया कि जीवन की अशांति के क्षणों में बाबा के इन शब्दों का स्मरण करते ही असीम शांति प्राप्त होती है।

🕉️ शिव-भक्ति, दो दिव्य सर्प एवं साक्षात् पार्वती स्वरूप माँ

शिव-भक्ति एवं कुटी के दो सर्प

बाबा शिव के अनन्य उपासक थे। मान्यता है कि गोरखपुर में योग साधना के समय स्वयं भगवान शंकर ने संन्यासी बाबा का रूप धारण कर उन्हें योग के गुप्त तत्वों से अवगत कराया था। इसी अनन्य शिव-भक्ति के कारण बाबा ने बद्रीनाथ में शिव चरणों में अपनी प्रिय वाणी अर्पित कर सदाकाल के लिए मौन धारण कर लिया था।

दो विशालकाय सर्प: कहरा कुटी में बाबा के सानिध्य में दो विशालकाय सर्प रहते थे। बाबा स्वयं उन्हें अपने हाथों से दूध पिलाते थे। वे कुटी के भीतर शांत रहते थे। बाबा के महाप्रयाण से कुछ समय पूर्व ही दोनों सांपों ने शरीर त्याग दिया। बाबा ने स्वयं उनका विधिवत अंतिम संस्कार किया और भक्तों से कहा: "अपनी प्रिय वस्तु भी यदि साथ छोड़ दे, तो स्वयं की मृत्यु निकट समझो।" आगे चलकर यह दर्शन पूर्णतः सत्य सिद्ध हुआ।

साक्षात् पार्वती स्वरूपा माँ का आशीर्वाद

काशी प्रवास में अस्सी संगम के बड़ा जगन्नाथ जी मंदिर परिसर में एक दिव्य माता (माँ) रहती थीं। बाबा उन्हें साक्षात् पार्वती रूप मानते थे और प्रातः उठकर सर्वप्रथम उन्हें प्रणाम करते थे। माँ ने ही बाबा को आत्मज्ञान प्रदान किया था।

शून्य में आसन (हवा में लेविटेशन): एक बार भक्तों की जिज्ञासा पर बाबा उन्हें माता की कोठरी की ओर ले गए। वहाँ भक्तों ने देखा कि माँ ध्यानस्थ थीं और उनका आसन पृथ्वी से ऊपर शून्य (हवा) में स्थित था। बाबा भी उन्हें देखकर ध्यानमग्न हो गए। दो घंटे बाद जब माँ सामान्य अवस्था में लौटीं, तो उन्होंने अपने बेटे मौनी के सिर पर ममतामयी हाथ फेरकर गले लगाया। इस वात्सल्यमयी घटना के बाद माता मंदिर परिसर में फिर कभी दिखाई नहीं दीं।

काशी प्रवास एवं श्मशान साधना:

बाबा वर्ष में छह महीने काशी, तीन महीने कहरा कुटी और तीन महीने तीर्थ भ्रमण में व्यतीत करते थे। काशी में वे अस्सी संगम के निकट बड़ा जगन्नाथ जी मंदिर परिसर में ठहरते थे। रात्रि के सन्नाटे में वे श्मशान भूमि में साधनारत रहते थे, जिसके बारे में पास रहने वाले लोगों को भी पता नहीं चल पाता था। काशी के ही एक वृद्ध नागा साधु ने अश्रुपूर्ण नयनों से बताया था— "उस मौनी को कौन नहीं जानता? वे पहुँचे हुए परम सिद्ध महात्मा थे। उनके काशी आगमन पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। वे श्मशान में रहते थे। उस राह की खोज में मैं आज भी हूँ जिससे उन्हें वह दिव्य ज्योति प्राप्त हुई।"

निःस्वार्थ भाव एवं भंडारे का चमत्कार:

बाबा काशी में कभी किसी का कोई व्यक्तिगत उपहार या दान स्वीकार नहीं करते थे। फल और मिठाइयों के ढेर लग जाते तो उन्हें तुरंत साधु-संतों एवं दीन-दुखियों में वितरित कर देते थे। संध्या पूर्व अपने हाथों से एक समय का भोजन तैयार करते थे। यदि कोई भूखा साधु आ जाता, तो उसी भोजन में से थोड़ा सा भाग निकालकर दे देते थे और वह थोड़ा सा प्रसाद भी उस साधु का पेट पूर्णतः तृप्त कर देता था। इस दिव्य घटना पर बाबा मुस्कुराकर लिख देते थे— "यह माँ की कृपा है।"

"लोगों के सामने छिपने की चेष्टा करो - जैसे कि मैं छिपा हूँ।"

— मौनी बाबा (विशिष्ट भक्तों को निर्देश)

देश-प्रेम, सामाजिक चेतना एवं स्वतंत्रता संग्राम

परमपूज्य मौनी बाबा केवल एक सिद्ध योगी ही नहीं थे, बल्कि उनके हृदय में राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम और स्वाधीनता की तीव्र आकांक्षा थी। वे क्रांतिकारियों के परम मार्गदर्शक और संरक्षक थे।

नमक सत्याग्रह (1930) एवं खादी व्रत

बाबा वर्ष 1901 से ही निरंतर स्वदेशी खादी वस्त्र धारण करते थे। ब्रिटिश शासनकाल में खादी पहनना एक मौन विद्रोह था, जिसकी उन्होंने तनिक भी परवाह नहीं की।

सुखासन की फुलवारी में नमक निर्माण: वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के नमक कानून भंग आंदोलन के समर्थन में बाबा ने स्वयं क्रांतिकारियों का सफल नेतृत्व किया। कहरा कुटी से एक मील दूर सुखासन बस्ती की फुलवारी में नमक बनाकर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी। उनके साथ शिवनन्दन मंडल (रानीपट्टी), शिवाधीन सिंह (सुखासन), कुंज बिहारी लाल दास, ठाकुर प्रसाद सिंह (मदनपुर), रमेशवर झा (कहरा) आदि सहित अपार जनसमूह था। आज उसी पावन स्थल पर 'अनुग्रह उच्च विद्यालय' स्थित है जो समाज में शिक्षा की ज्योति फैला रहा है।

अंग्रेज सिपाहियों का धावा व वारंट

नमक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण बाबा के नाम भी गिरफ्तारी का वारंट जारी हुआ। गोरा पलटन ने कुटी पर धावा बोलकर दहशत फैलाने की चेष्टा की।

कुटी पर बैठे भक्त भय से कांप उठे, किंतु बाबा के कांतिमय मुख पर लेशमात्र भी चिंता नहीं थी। बाबा ने सहजता से लिखकर संदेश दिया: "मुझे पकड़ के ले चलो।" बाबा के तेजस्वी, भव्य और गंभीर स्वरूप को देखकर ब्रिटिश अधिकारी विस्मित हो गया और उनके कदमों में झुक गया। उसने अपनी डायरी में लिखा: "मौनी बाबा परम सिद्ध योगी हैं, इन्हें संसार से क्या मतलब! इन्हें जेल ले जाने पर भक्त विद्रोह कर देंगे और हजारों लोग इनके साथ जेल चले जाएंगे।" वारंट स्वतः निरस्त हो गया।

कष्ट-हरण: प्रथम न्याय मंत्री का संस्मरण

स्वतंत्रता सेनानी शिवनन्दन मंडल (बिहार के प्रथम न्याय मंत्री) ने अपना एक अद्भुत अनुभव साझा किया था:

"1930-31 में मैं मधेपुरा जेल में बंद था। रिहाई के दिन मैं गंभीर रूप से बीमार था। जेल के फाटक से निकलते ही मुझे अनुभव हुआ जैसे बाबा स्वयं अपने भक्तों के साथ मेरी अगवानी कर रहे हैं। मैं जैसे ही कहरा कुटी पहुँचा, क्षणभर में पूरी तरह स्वस्थ हो गया। कुटी के अंदर जाकर देखा तो बाबा अनेक कंबल ओढ़े अस्वस्थ लेटे हुए थे। भक्तों ने बताया कि बाबा अभी-अभी अचानक अस्वस्थ हुए हैं। बाबा जगे, मेरी ओर देखकर हँसे और आशीर्वाद दिया। वे भक्तों के कष्ट स्वयं पर ले लेते थे। उन्हीं की कृपा से मैं न्याय मंत्री बना।"

लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं वन-भोजन

क्रांतिकारियों को कुटी पर गुप्त रूप से शरण एवं भोजन मिलता था, जिसकी जानकारी बाबा के निकटवर्ती भक्तों को भी नहीं होती थी।

हजारीबाग जेल से भागने के बाद: जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) हजारीबाग जेल से भागकर आए, तो वे खपौती के जंगलों में छिपे थे। खुफिया विभाग पीछे लगा था। कुटी से प्रतिदिन रात्रि को भोजन बनाकर जंगलों में भेजा जाता था। एक रात नदी पार कराने वाली नाव न मिलने पर भक्तों ने भोजन आम के पेड़ पर लटका दिया और कुटी में सो गए। अगली सुबह जब वे क्षमा मांगने JP के पास पहुँचे, तो JP ने विस्मित होकर कहा— "हम भूखे नहीं रहे, रात्रि को एक अज्ञात युवक आकर हमें स्वादिष्ट भोजन दे गया था।" यह बाबा की ही अलौकिक लीला थी।

चन्द्रशेखर आज़ाद का गुप्त काशी प्रवास

महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद (पंडित जी) ने भी बाबा के काशी प्रवास के दौरान गुप्त रूप से उनकी शरण ली थी।

आज़ाद ने वेश बदलकर कई दिनों तक अस्सी संगम के बड़ा जगन्नाथ जी मंदिर परिसर में बाबा की सेवा की। अंतर्यामी मौनी बाबा ने उन्हें राष्ट्र सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने का सच्चा मार्गदर्शन और आशीर्वाद दिया था।

बाबा की अद्भुत राष्ट्र-दूरदर्शिता

बाबा ने क्रांतिकारियों को फाँसी के फंदे से बचाया, जैसे सांसद अनूप लाल मेहता और यदुनन्दन झा (विधायक, खगड़िया)।

अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन क्यों? बाबा ने 1933 में कुटी के खर्च पर प्रथम मिडल इंग्लिश स्कूल की स्थापना कराई। उनका मानना था कि समाज अंग्रेजी भाषा को सीखकर अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों को समझ सके और स्वयं को बौद्धिक रूप से स्वतंत्र कर सके। उनकी यह दूरदर्शिता समाज को गुलामी से मुक्त कराने का एक महान माध्यम बनी।

"राष्ट्र की सेवा और समाज का उत्थान ही सबसे बड़ा धर्म है।"

— मौनी बाबा के राष्ट्र संदेशों का सार

विरासत एवं महाप्रयाण

अगस्त 1944 से बाबा का स्वास्थ्य कभी-कभी अस्वस्थ रहने लगा, किंतु उनकी दैनिक साधना में कोई रुकावट नहीं आई। उनके निकटस्थ भक्तों को महाप्रयाण की तिथि का पूर्वज्ञान हो गया। भक्तों ने काशी चलने का आग्रह किया, परंतु उन्होंने कहा — "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" — और अपनी कुटी को ही अंतिम स्थान चुना। उन्होंने स्वयं उत्तर दिशा में दाह-संस्कार स्थल का संकेत किया।

6 फरवरी 1945, प्रातः 11 बजकर 55 मिनट, फाल्गुन शुदी चौठ, शुक्रवार को — अपने भक्तों की ओर दृष्टि डाल, हँसकर, अंगुलियों पर जप करते हुए — वे इस संसार से विदा हुए। उनके जन्म और महाप्रयाण की तिथि एक ही है — 6 फरवरी — जो स्वयं में एक अद्भुत दिव्य संयोग है।

कहरा कुटी आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था, प्रेरणा और आध्यात्मिक जागरण का केंद्र है।

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पावन भूमि मिथिला और मौनी बाबा

महान योगी मौनी बाबा के जीवन में मिथिला की पावन धरा का अत्यंत गहरा संबंध था। उनके महाप्रयाण के समय बाबा ने एक अत्यंत गंभीर और रहस्यमयी दर्शन दिया था:

"सर्व पाप विनस्यति वाराणसी और वाराणसी कूतं पाप मिथिलायाम् विनस्यति"
मनुष्य के सभी पाप काशी में मृत्यु होने से धुल जाते हैं, लेकिन काशी में किये गये पापों का निवारण केवल मिथिला की भूमि पर ही संभव है।

यही कारण था कि अपार योगशक्तियों के स्वामी होने के बावजूद, बाबा ने अपने जीवन का अंतिम समय और महाप्रयाण काशी (वाराणसी) के बजाय अपनी जन्मभूमि मिथिला (कहरा ग्राम) में ही चुना।

📜 बृहद विष्णु पुराण एवं पौराणिक महत्ता

बृहद विष्णु पुराण में मिथिला को नमन करते हुए लिखा गया है:

"मिथिलां ये नमस्यन्ति देशान्तर गता अपि तेषां मुक्तिश्च भुक्तिश्च जायते नात्र संशयः।
मिथिलाबासमासादय जीवन्मुक्तो भवेन्नरः।"

(जो मनुष्य अन्य देशों में रहकर भी मिथिला को नमन करते हैं, उन्हें भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं। मिथिला में वास करने से मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।)

🌾 मिथिला के महान ऋषि, विदुषी और संत परंपरा

मिथिला अनादि काल से ही ज्ञान, दर्शन और तपस्या का तपोवन रही है। बाबा के जीवन और साधना के संदर्भ में इस क्षेत्र के निम्नलिखित ऐतिहासिक स्थलों और व्यक्तित्वों का बड़ा महत्व है:

राजा जनक और याज्ञवल्क्य

राजा जनक के विदेह दरबार में महर्षि याज्ञवल्क्य (प्रधान स्मृतिकार), विदुषी गार्गी और मैत्रेयी वेदान्त दर्शन पर संवाद करते थे। स्वयं वेदव्यास ने अपने पुत्र शुकदेव को विशिष्ट अध्ययन के लिए राजा जनक के पास मिथिला भेजा था।

न्याय, सांख्य और महाभारत

न्यायशास्त्र के गौतम ऋषि (अहल्या उद्धार स्थल 'अहैरी', दरभंगा) और सांख्यदर्शन के कपिल मुनि (कपिलेश्वर) यहीं जन्मे। महाभारत काल में भीम और दुर्योधन ने दरभंगा के बलैना ग्राम में गदायुद्ध सीखा था।

महिषी और शंकराचार्य शास्त्रार्थ

9वीं शताब्दी में वेदान्त के वाचस्पति मिश्र और मंडन मिश्र हुए। महिषी (सहरसा) में मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी भारती ने जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में परास्त किया था।

लक्ष्मीनाथ गोस्वामी एवं विद्यापति

12वीं सदी के गीतगोविंद प्रणेता जयदेव, 14वीं सदी के मैथिल कोकिल विद्यापति, और 19वीं सदी के महान हठयोगी लक्ष्मीनाथ गोस्वामी (जिनकी कुटी बनगाँव, सहरसा में है), इसी पावन भूमि की उपज थे।

"मिथिला की मिट्टी के प्रत्येक कण में ऋषियों की ऊर्जा और ज्ञान का वास है।"

— मौनी बाबा की जन्मभूमि निष्ठा

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जीवन कालक्रम

पुस्तक "ऐसे थे सद्गुरु हमारे" – लेखक बटेश महाराज के आधार पर

1863
जन्म – कहरा ग्राम
6 फरवरी 1863, थाना मधेपुरा, जिला भागलपुर (अब सहरसा)। पिता: पं. बुलाकी मिश्र। बाल्यकाल नाम: मनमोहन मिश्र। भाई: जगमोहन मिश्र व अनिरुद्ध मिश्र।
~1873
संस्कृत व ज्योतिष अध्ययन
दस वर्ष की अवस्था में ग्राम बलवा, सहरसा में पं. नब्बू मिश्रजी के यहाँ संस्कृत व ज्योतिष अध्ययन। तदोपरांत संस्कृत विद्यालय सिहौल में दो वर्ष की शिक्षा।
1879
काशी गमन – वेदांत व ज्योतिष
ज्योतिष एवं वेदांत की विशिष्ट शिक्षा हेतु काशी पहुँचे। गुरु: पं. पुरुषोत्तम जी शर्मा। काशी में गीता के परमतत्त्व का वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया।
~1883
गोरखपुर – योग शिक्षा
काशी से वैराग्य के बाद गोरखपुर पहुँचे। गुरु गोरखनाथ के शिष्य एक संन्यासी से योग की गहन शिक्षा। गोरखपुर की पहाड़ी पर साधना।
~1901
कहरा कुटी की स्थापना
बड़े भाई पं. लक्ष्मीनाथ मिश्रजी ने कहरा में कुटी बनाई। यह स्थान आजीवन साधना-स्थल बना। 1903–04 के सर्वे मानचित्र में दर्ज।
1901–1922
भारत भ्रमण एवं योग साधना
खादी वस्त्र धारण आरंभ। अनेक बार भारत भ्रमण, योगाभ्यासी साधुओं की सत्संगति। प्राणायाम काल में आसन शून्य में स्थित देखा गया।
~1921
नमक आन्दोलन व मौन व्रत
1921 में नमक आन्दोलन में स्वतंत्रता प्रेमियों का साथ दिया। बद्रीनाथ यात्रा के बाद वाणी का सदा-सर्वदा परित्याग — "मौनी बाबा" नाम से विख्यात।
1933
मिडल इंगलिश स्कूल की स्थापना
क्षेत्र का प्रथम अंग्रेजी स्कूल। कुटी ने तीन वर्ष तक शिक्षकों का वेतन, छात्रों की फीस व गरीब छात्रों का भोजन वहन किया। सौ से अधिक छात्रावास निवासी।
1942
स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग
1942 की क्रांति में जंगलों में छिपे स्वयंसेवकों को कुटी से भोजन पहुँचाया गया। गिरफ्तार भक्तों की सहायता की।
1945
महाप्रयाण
6 फरवरी 1945, प्रातः 11:55 बजे, फाल्गुन शुदी चौठ, शुक्रवार — हँसते हुए, जप करते हुए, समाधिस्थ होकर इस संसार से विदा हुए। जन्म और महाप्रयाण एक ही तिथि — 6 फरवरी।